पर्यावरण शिक्षण का महत्व

हमारे पर्यावरण में सभी चीजें उपस्थिति हैं और सभी चीजें सभी के लिए है और इन सभी चीजों को सभी के लिए बचाए रखने के लिए, पर्यावरण शिक्षण अति आवश्यक है। पर्यावरण शिक्षण के महत्व निम्नलिखित हैं:

👉पर्यावरण शिक्षण हमें पर्यावरण की समस्याओं, उनके निदान और पर्यावरण का संरक्षण  करना सिखाता है।
👉पर्यावरण शिक्षण के द्वारा हम पर्यावरण को संतुलित रख सकते हैं।
👉पर्यावरण शिक्षण नागरिक चेतना को बढ़ाती है।
👉 पर्यावरण शिक्षण हमें पर्यावरण और मनुष्य की क्रियाओं के बीच के संबंध को दर्शाता है।
      पर्यावरण शिक्षण से हमें ज्ञात होता है कि पर्यावरण के घटक- जैविक (पेड़-पौधे, जानवर) और              अजैविक (प्रकाश, वायु, जल इत्यादि)। हमारे लिए क्यों आवश्यक हैं।
👉पर्यावरण शिक्षण हमें प्रदूषण एवं उससे जनित दुष्प्रभावों के विषय में आता है।

    पर्यावरण शिक्षण के उद्देश्य

    पर्यावरण शिक्षण के दौरान हमें पियाजे के कथन, 'बच्चे दुनिया के बारे में अपनी समझ का सृजन करते हैं।' के मद्देनजर निम्न उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए:


    👉पर्यावरण के प्रति विद्यार्थियों में जिज्ञासा, रुचि, कल्पना एवं स्मरण शक्ति का विकास करना।
    👉आस-पास के पर्यावरण से विद्यार्थियों को परिचित कराना।
    👉 विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति. सम्पूर्ण (साकल्यवादी) दृष्टिकोण का विकास करना।
           प्राकृतिक भिन्नता एवं इसके कारणों को बताना।
    👉विद्यार्थियों को यह बताना कि पर्यावरण हमारा धरोहर है और हम उसके पालक हैं। अतः भौतिक         परिवेश के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता का विकास करना।
    👉विद्यार्थियों में सामाजिक परिवेश के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता का विकास करना। 

            उनमें सामाजिक मूल्यों एवं भावनाओं का विकास करना

            ताकि वे स्वस्थ स्पर्धा के लिए तैयार हो सकें।
    👉मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले पर्यावरण के विभिन्न प्रभावों को बताना।
    👉पर्यावरण प्रदूषण एवं पर्यावरण संरक्षण के विषय में जानकारी देना।
    👉विद्यार्थियों को सामाजिक समस्याओं से अवगत कराना अर्थात् वास्तविक जीवन की चिन्ताओं के विषय में समझ उत्पन्न करना।

    सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक 

    किसी भी बच्चे विद्यार्थी के सीखने की प्रक्रिया निम्नलिखित कारणों/कारकों से प्रभावित होती है:

    1. व्यक्तिगत कारक
    2. वातावरणीय कारक

    व्यक्तिगत कारक 


    इन कारकों में निम्नलिखित कारक आते हैं:


    बुद्धि, रुचि, इच्छा, दृढ़ता, परिपक्वता, अभिप्रेरणा अभ्यास, चिंता, थकान
    स्वअध्ययन की विधि 

    वातावरणीय कारक

        ये कारक निम्नलिखित हैं:

    👉परिवार, विद्यालय और समाज का वातावरण,
          कक्षा का वातावरण 
    👉शिक्षक का व्यक्तित्व, अध्यापन विधि और
    अध्ययन सामग्री 
    👉विषय का स्तर, पुरस्कार एवं दंड
    👉शिक्षा की गुणवत्ता